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CG : ईसाई पादरियों पर ग्राम सभा के ‘प्रवेश प्रतिबंध’ बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, रोक की मांग खारिज

छत्तीसगढ़ : ईसाई पादरियों पर ग्राम सभा के ‘प्रवेश प्रतिबंध’ बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, रोक की मांग खारिज
रायपुर। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में ग्राम सभाओं द्वारा गांव के प्रवेश द्वारों पर लगाए गए उन होर्डिंग/नोटिस बोर्डों के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी, जिनमें ईसाई पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक का उल्लेख था। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने आज सुनवाई के बाद याचिका निरस्त कर दी। इसके साथ ही ग्राम सभाओं के पक्ष में फैसला बरकरार रहा। इस फैसले को ग्राम सभाओं की बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है। मामले में छत्तीसगढ़ पंचायत विभाग ने भी पक्ष रखा और ग्राम सभाओं की कार्रवाई का समर्थन किया। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को लेकर प्रदेश के गृहमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि ग्राम सभा को सुप्रीम कोर्ट से जीत मिली है। ग्रामीण अपनी संस्कृति को बचाने के लिए ऐसा कर सकते हैं।

जानिए क्या था विवाद?

बता दें कि विवाद कांकेर जिले की अनेक पंचायतों में लगाए गए उन बोर्डों से जुड़ा था, जिनमें ईसाई धर्म प्रचारकों के गांव में प्रवेश पर निषेध का उल्लेख था। ग्राम सभाओं का तर्क था कि गांवों में जबरन या प्रलोभन देकर धार्मिक परिवर्तन (कन्वर्ज़न) की आशंका को रोकने तथा अपनी परंपराओं के संरक्षण के लिए यह कदम उठाया गया।

ईसाई धर्म प्रचारक समुदाय ने इन बोर्डों को चुनौती देते हुए पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था कि पेसा कानून के तहत ग्राम सभाएं अपनी परंपरा और सामाजिक संरचना के संरक्षण के लिए ऐसे निर्णय ले सकती हैं। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को ग्राम सभा के समक्ष अपनी बात रखने की स्वतंत्रता भी दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

हाईकोर्ट के निर्णय के विरुद्ध ईसाई धर्म प्रचारक समुदाय ने शीर्ष अदालत में अपील दायर की। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने दलील दी कि प्रवेश निषेध असंवैधानिक है और बिना पर्याप्त साक्ष्य के धर्मांतरण की आशंका मान ली गई है। उन्होंने कहा कि “एक भी कन्वर्ज़न मामले में सजा का रिकॉर्ड नहीं है।”

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि शीर्ष अदालत में नए तथ्य रखे जा रहे हैं और यदि नए पहलू हैं तो याचिकाकर्ता पुनः हाईकोर्ट जा सकते हैं। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने हाईकोर्ट के फैसले के पैरा 34 का उल्लेख करते हुए याचिकाकर्ता से मूल प्रार्थनाओं पर ध्यान दिलाया। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।

गृहमंत्री विजय शर्मा बोले— गांव वाले अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए उठा सकते हैं ऐसा कदम

गृहमंत्री विजय शर्मा ने इस मामले में कहा कि छत्तीसगढ़ के अनेक गांवों में ग्राम सभा द्वारा बोर्ड लगाया गया था कि ईसाई धर्म प्रचारकों के गांव में प्रवेश पर प्रतिबंध है। इस मामले को लेकर धर्म प्रचारक हाईकोर्ट भी गए थे। हाईकोर्ट ने भी अपने निर्णय में कहा कि पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र के गांवों में पेसा कानून लागू है। इसलिए अपनी संस्कृति के संरक्षण के लिए वे ऐसा कर सकते हैं। फिर हाईकोर्ट में ग्राम सभा की जीत के बाद याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट आए, जहां आज उनकी याचिका खारिज हुई है। वहीं इस निर्णय से ग्राम सभा को जीत मिली है। इसका मतलब यह हुआ कि गांव वाले अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए ऐसा कदम उठा सकते हैं।

क्या होगा असर?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद हाईकोर्ट का फैसला प्रभावी रहेगा। अर्थात्, संबंधित ग्राम सभाएं यह निर्णय लेने के लिए अधिकृत रहेंगी कि गांव में ऐसे धर्म प्रचारकों का प्रवेश हो या नहीं।

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