
वीडियो फुटेज ने पेश किए सबूत
दिल्ली की अदालत में पेश किए गए वीडियो फुटेज मामले में अहम सबूत साबित हुए। अदालत में दिखाए गए इन फुटेज में कथित तौर पर कांग्रेस नेता अलका लांबा पुलिसकर्मियों को धक्का देती, बैरिकेड्स पार करती और प्रदर्शनकारियों को संकेत देकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती दिखाई देती हैं। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अश्विनी पंवार ने कहा कि उपलब्ध वीडियो एवं अन्य सामग्री प्रथम दृष्टया यह संकेत देती है कि प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था भंग हुई और कानून-व्यवस्था में बाधा पहुंचाई गई। अदालत ने माना कि ये सबूत गंभीर शक पैदा करते हैं, इसलिए मामले में मुकदमा चलाना आवश्यक है। मजिस्ट्रेट ने यह भी साफ किया कि अदालत अभी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँची है। सबूतों की विश्वसनीयता, प्रमाणिकता और घटनाक्रम का पूरा मूल्यांकन ट्रायल के दौरान किया जाएगा।
लगाए गए आरोप
दिल्ली की अदालत ने कांग्रेस नेता अलका लांबा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत आपराधिक आरोप तय कर दिए हैं। अदालत के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान कथित रूप से पुलिसकर्मियों को ड्यूटी से रोकने के लिए बल का प्रयोग किया गया और सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा पहुंचाई गई। आरोप जिन प्रमुख धाराओं के तहत तय किए गए हैं, उनमें शामिल हैं-
सार्वजनिक सेवक को उसकी ड्यूटी से रोकने के लिए हमला या बल प्रयोग, सार्वजनिक सेवक को बाधा पहुंचाना या उसके कार्य में बाधा डालना, किसी विधि-सम्मत आदेश की अवज्ञा करना, सार्वजनिक मार्ग पर अवरोध या खतरा उत्पन्न करना अदालत ने कहा कि उपलब्ध वीडियो फुटेज और अन्य सामग्री प्रथम दृष्टया आरोपों का समर्थन करती है, और इसलिए मुकदमे को आगे बढ़ाया जाएगा। इसके साथ ही, अलका लांबा द्वारा दायर की गई बरी होने की अर्जी (डिस्चार्ज पिटिशन) को अदालत ने खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अब मामले का ट्रायल चलेगा, जिसमें सबूतों और गवाहों की विस्तृत जांच की जाएगी और अंतिम निर्णय दिया जाएगा।
बचाव पक्ष का तर्क
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि जंतर-मंतर के पास हुआ प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था और निर्धारित क्षेत्र के भीतर ही आयोजित किया गया था। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष किसी स्वतंत्र गवाह को प्रस्तुत नहीं कर पाया और न ही पुलिसकर्मियों को चोट पहुंचने के कोई ठोस सबूत सामने लाए गए हैं। वीडियो फुटेज का उल्लेख करते हुए बचाव पक्ष ने दावा किया कि उनमें न तो हमला दिखता है और न ही सार्वजनिक मार्ग अवरुद्ध करने की कोई स्थिति स्पष्ट रूप से नजर आती है। अतः आरोपों में दम नहीं है और आरोपी को राहत दी जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस चरण में केवल यह देखा जाता है कि आरोपों को समर्थन देने के लिए प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री मौजूद है या नहीं। अदालत ने माना कि प्रस्तुत वीडियो फुटेज और दस्तावेज प्रारंभिक रूप से गंभीर शक पैदा करते हैं। इसलिए बचाव पक्ष की दलीलें फिलहाल स्वीकार नहीं की जा सकतीं।
क्या है मामला?
दिल्ली की एक अदालत ने कांग्रेस नेता अलका लांबा के खिलाफ आपराधिक आरोप तय कर दिए हैं। मामला 29 जुलाई 2024 को जंतर-मंतर के पास हुए उस प्रदर्शन से संबंधित है, जब क्षेत्र में निषेधाज्ञा लागू थी और संसद घेरने की अनुमति नहीं दी गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इसके बावजूद अलका लांबा ने कथित रूप से प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व किया और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। आरोप है कि उन्होंने पुलिसकर्मियों को धक्का दिया, बैरिकेड्स पार किए और भीड़ को आगे बढ़ने के लिए इशारे से उकसाया। अभियोजन का दावा है कि इससे सड़क पर अवरोध पैदा हुआ और सार्वजनिक आवागमन प्रभावित हुआ, साथ ही स्थानीय लोगों व राहगीरों को परेशानी उठानी पड़ी।
कोर्ट में पेश वीडियो फुटेज में उन्हें बैरिकेड पार करते और पुलिस से धक्का-मुक्की करते देखा गया, जिसे अदालत ने प्रथम दृष्टया सबूत मानते हुए कहा कि यह गंभीर शक पैदा करता है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने टिप्पणी की कि प्रस्तुत सबूतों को देखते हुए आरोप तय करना उचित है और मुकदमे की आवश्यकता बनती है। बचाव पक्ष ने यह तर्क दिया कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और निर्धारित इलाके में ही रहा, साथ ही किसी स्वतंत्र गवाह या चोट के प्रमाण नहीं हैं। लेकिन अदालत ने कहा कि इस चरण पर केवल यह देखा जाता है कि आरोपों का आधार है या नहीं, और विस्तृत जांच ट्रायल के दौरान होगी।