
कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि जब 2013 से मान्यता की अनिवार्यता थी, तब 12 वर्षों तक बिना अनुमति स्कूल कैसे चलते रहे। चीफ जस्टिस ने कहा कि, आपने 25 जुलाई को कमेटी बनाई और दो दिन में रिपोर्ट भी आ गई। यह पूरी प्रक्रिया केवल बड़े स्कूल संचालकों को बचाने के लिए की गई है। कोर्ट ने आगे कहा कि बच्चों और पालकों से फर्जीवाड़ा करने वाले स्कूलों पर क्रिमिनल केस दर्ज करें और सभी बच्चों को मुआवजा दिलाएं।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने स्पष्ट कहा कि आप लोगों ने बच्चों और पालकों के साथ फ्राड किया है। गली-मोहल्ले में स्कूल खोलकर लाखों रुपये कमाए और खुद मर्सिडीज में घूम रहे हैं। बच्चों को मुआवजा दिलवाइए, तो इनके द्वारा कमाया गया सारा पैसा निकल जाएगा।
सुनवाई के दौरान जब कोर्ट को बताया गया कि शिक्षा सचिव अवकाश पर हैं, तो चीफ जस्टिस ने तीखी टिप्पणी की और कहा कि सचिव साहब तो हमारे डर से 15 दिन की छुट्टी को 30 दिन बढ़ा देंगे। इतने गंभीर मामले में सचिव की गैरहाजिरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कोर्ट ने 13 अगस्त तक शिक्षा सचिव से या उनकी अनुपस्थिति में संयुक्त सचिव से नया शपथ पत्र दाखिल करने कहा है।
5 लाख मुआवजा देने के निर्देश
कोर्ट ने निर्देश दिए कि जिन स्कूलों ने 12 वर्षों तक बिना मान्यता के संचालन किया है, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रिपोर्ट प्रस्तुत करें। प्रभावित बच्चों को पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा दिलवाकर अन्य स्कूलों में शिफ्ट कराया जाए।